समता के प्रतीक होली पर्व की पौराणिक कथा हिरण्यकश्यप, होलिका और प्रह्लाद के त्रिकोणी द्वन्द्व एवं सघर्ष की जिस पराकाष्ठा को स्पर्श करती है, वह सम्भवतः अन्यत्र न पाई जाने वाली अपने किस्म की अनूठी मिसाल है। कारण यह कि प्रह्लाद ही सबसे पहला क्रान्तिकारी था जिसने अपने पिता हिरण्यकश्यप तथा व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह किया और अपने मिशन में सफल भी हुआ। उल्लेखनीय है कि संसार में सभी क्रान्तियों का विरोध हुआ है, लेकिन प्रह्लाद के प्रति कोई प्रतिक्रान्ति नहीं हुई। इतिहास क्रम यही है कि जब भी किसी धर्मात्मा ने अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई तो उसे खामोश करने के लिए तरह-तरह के षड़्यन्त्र रचे गए ताकि पूर्व स्थापित व्यवस्था सही सलामत बनी रहे।
हिरण्यकश्यप अनाचार व भ्रष्टाचार का प्रतीक रहा है। हिरण्यकश्यप घमण्डी एवं अत्याचारी बनकर अपने उत्पात से लोगों में त्राहि-त्राहि मचाने लगता है। वह अपने राज्य में यहाँ तक घोषणा कर देता है कि ’‘भगवान का नाम न लेकर मेरा नाम ही लिया जाए। भगवान कहीं नहीं है, मैं ही भगवान हूँ।’’ ऐसा नहीं है कि आज यह देश हिरण्यकश्यपों से मुक्त हो गया है। आज भी हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान घोषित कर रहे हैं और राजनैतिक मुखौटे लगाकर सत्ता के गलियारों में पहुंच रहे हैं। वे मनचाही साजिशों को रचते हैं, साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों को हवा देते हैं तथा हिंसा की आन्धी से राष्ट्रीय एकता को चुनौैती देते हैं।
जाहिर है कि तब के समय ने केवल एक प्रह्लाद पैदा किया था, जो कभी न विचलित होने वाला था। सर्वव्यापी विष्णुरूपी परमात्मा की भक्ति करने से उस पर भगवान ’विष्णु’ की कृपा हुई थी। वह निर्भीक एवं अडिग था। इसलिए वह अपने पिता के मजबूर करने पर भी ‘भगवान विष्णु’ की जगह ‘भगवान हिरण्यकश्यप’ कहने एवं मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसी संवेदनशील बिन्दु से हमारे सामने दो मार्ग प्रस्तुत होते हैं- कुमार्ग और सद्मार्ग। कुमार्ग साम्प्रदायिकता, पीड़ा, बर्बरता और विनाश का रास्ता है। जबकि सद्मार्ग अहिंसा, शान्ति, सद्भावना, भाईचारा, सहयोग और निर्माण का रास्ता है। आज हर देशवासी को यह तय करना है कि उसे किस मार्ग पर चलना है। लेकिन आज का प्रह्लाद अवसरवादी है। वह व्यवस्था को जख्मी एवं तार-तार होते देख उसका विरोध नहीं करता है। उसे मालूम है कि विधान सभाओं, निगमों और शासनतन्त्र में अपनी जगह को सुरक्षित बनाए रखने के लिए व्यवस्था का साथ देना जरूरी है। यही वजह है कि हमारे समाज का अर्धसामंती संस्कार और अर्धपूँजीवादी रवैया पूरी चालाकी से लगा हुआ है कि वर्तमान स्थितिशीलता के विरुद्ध जो भी प्रामाणिक विरोध उठे अथवा आन्दोलन चले, भीतर ही भीतर उसके मूल मुद्दों को विखण्डित करके कुछ ऐसी स्थिति पैदा की जाए कि वह व्यवस्था के लिए खतरा होने के बजाय उसके पोषक तत्वों में बदल जाए। सवाल यह नहीं है कि इधर का प्रह्लाद किसके ‘विरुद्ध’ हैं। प्रमुख सवाल यह है कि वह ‘पक्ष में’ किसके है। यह कहने में संकोच नहीं कि जहाँ तक वर्ग सहानुभूति की बात है तो वह ‘खरगोश’ के साथ है, लेकिन जहाँ कर्म एवं निजी स्वार्थ का मामला है तो वह खरगोश के भक्षकों के साथ है। फिर यहाँ के प्रह्लाद से अन्यायपूर्ण व्यवस्था एवं इसके संरक्षकों के खिलाफ चुनौती व टक्कर की कैसे उम्मीद की जा सकती है!
तब के प्रह्लाद के पास सत्य, आस्था और प्रेम तीनों चीजें थीं। इसलिए वह आग के अन्दर होते हुए भी साफ बच गया था और कभी न जलने वाली होलिका जलकर राख हो गई थी। पर इधर का पह्लाद निरन्तर जलता रहता है, तनाव, धन लोलुपता, स्वार्थसिद्धि, ईर्ष्या, कलह और भेद-भाव की लपटों में। अपने बचाव के लिए वह न तो नाम स्मरण करता है तथा न ही स्दमार्ग पर चलने की कोशिश करता है। अतः जलना ही नाम है आज के प्रह्लाद का। उसकी आँखों के सामने कानून को फाँसी दी जा रही है, असली गुनहगारों को छोड़ा जा रहा है, काले कारनामों एवं गैरकानूनी हरकतों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है, शोषण-अत्याचार अपनी चरमसीमा पर हैं, लेकिन वह चुपचाप खड़ा यह तमाशा देख रहा है। यदि वह कोशिश करे तो पहले के प्रह्लाद का दर्जा प्राप्त कर सकता है और अमानवीय ज्यादतियों को रोककर व्यवस्था को नई शक्ल दे सकता है।
हाँ हर साल होलिका दलन के बावजूद होलिका जलती नहीं है। वह आज भी जिन्दा है और उसकी कुटील नीति हरी-भरी है। वैसे भी होलिका ने कभी भी अपनी नेक भूमिका नहीं निभाई। कहीं वह अपने भाई की साजिश में शामिल होकर प्रह्लाद को साथ लेकर जलती चिता में बैठी, कहीं वह वैदिक धर्म की कट्टर विरोधी राक्षसी बनी और आर्य जनता पर अत्याचार किए तथा कहीं कंस के कहने पर पूतना बनकर कृष्ण की हत्या के लिए निकल पड़ी। जाहिर है कि होलिका ने हमेशा बुराई का ही साथ दिया एवं अपनी शक्ति को नेक कार्यों में लगाने की बात कभी नहीं सोची। वह सत्ता को संरक्षण प्रदान करती रही। उसके पास ऐसे कवच थे, जिनमें अनाचार, भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय सुरक्षा पाते रहे। यहाँ तक कि विनाश भी सुरक्षा पाता रहा।
आज दिक्कत यह है कि होलिका दहन नहीं हो रहा है, बल्कि प्रह्लाद जल रहा है। कालिमा इतनी बढ गई है कि प्रकाश विलुप्त होता जा रहा है। राजनीति के अपराधीकरण से सामाजिक खरपतवारी एवं अनैतिक तत्वों को सत्ता का आशीर्वाद व संरक्षण प्राप्त है। आज भी पुराने सामन्ती अवशेषों की घुसपैठ है, जो समूचे तन्त्र में फैलकर व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बन जाते हैं। सच्चे प्रह्लाद की अनुपस्थिति के कारण हम भी इस व्यवस्था का अंग होने से अपने को बचा नहीं पा रहे हैं। सवाल है कि हम होली के मानवतावादी सन्देश को कैसे साकार कर सकेंगे और लोगों के मन में प्रेम, समानता, एकता, सद्भावना और भाईचारे की सच्ची हिलोरें कब उठेंगीं।
होली पर्व समता का सन्देश देता है, जिसकी जड़ें भारत की मिट्टी में हैं। यह पर्व जहाँ संकीर्ण संस्कारों और रूढ़ियों का विनाश करके मानव हृदय को बलवान बनाता है, वहीं एकजूट रहने, समानता की भावना बनाए रखने तथा शाश्वत मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा भी देता है। शायद इसीलिए सिख गुरुओं ने होली के आध्यात्मिक पक्ष को समझते हुए इसे रंगों से ऊपर उठकर शारीरिक एवं आत्मिक बल के साथ जोड़ दिया। आज के प्रह्लादों को भी चाहिए कि वे अपनी शक्ति को देश के नवनिर्माण एवं व्यवस्था की गन्दगी के उन्मूलन में ही लगाएँ। (दिव्ययुग - मार्च 2013)
Motivational Speech on Vedas in Hindi by Dr. Sanjay Dev
Explanation of Vedas | बालक निर्माण के वैदिक सूत्र एवं दिव्य संस्कार-3