चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार भारतीय नववर्ष विक्रम सम्वत् का शुभारम्भ इस पवित्र दिवस से होता है। इस बार 16 मार्च 2013 को भारतीय विक्रम सम्वत 2070 का आरम्भ हो रहा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन इसलिए भी गौरवशाली माना जाता है क्योंकि बसन्त के आगमन से जहाँ एक ओर शीत से मुक्ति मिलती है वहीं दूसरी ओर नित्य नव-नव पर्वों की झड़ी सी लग जाती है। चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भारतीय नवसम्वत् का आरम्भ हर्षोल्लास के साथ होता है। बासन्ती नवरात्र महोत्सव का श्रीगणेश चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होने वाले नवसम्वत् एवं वैशाखी पर्व की समरसता भी उजागर होती है। इस दिन प्रारम्भ होेने वाला भारतीय नवसम्वत् ‘चन्द्रमास’ की पद्धति पर अवलम्बित है, तो इसके बाद आने वाली संक्राति पर मनाया जाने वाला नवसम्वत् वैशाखी पर्व सौर मास से सम्बद्ध कालगणना पर आश्रित है।
सम्वत्सर का प्रवर्तन राष्ट्र के पराक्रम, पौरुष, पुरुषार्थ, विजय एवं वैभव की कसौटी है। इस कसौटी पर विक्रम सम्वत्सर ही खरा उतरता है। मालवाधीश शकारि विक्रमादित्य की सत्तावन ई.पू. में ही शंकों पर विजय को महिमामण्डित करने के लिए यह सम्वत् विक्रमादित्य के नाम से जोड़ा गया। विक्रमादित्य कर्मशील, व्यावहारिक और राजनीति के क्षेत्र में अग्रगण्य हैं। प्रभावक चरित के अनुसार विक्रमादित्य ने एक परित्राता का कार्य किया। थोड़े ही समय में शक वंश को उखाड़कर राजा विक्रमादित्य एक सार्वभौम सम्राट् की तरह सामने आये। देश को अव्यवस्था से मुक्त कर उन्होंने एक नए युग का सूत्रपात् किया। जिस प्रकार त्रेतायुग में आदि कवि वाल्मीकि और भगवान श्रीराम हुए और उसके पश्चात् द्वापर में सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न व्यास और योगीराज श्रीकृष्ण हुए। उसी प्रकार कलियुग में भारतीय इतिहास में राजा विक्रमादित्य और महाकवि कालिदास का अनूठा संयोग हुआ। पूजा की दृष्टि से उनका स्थान राम और कृष्ण के बाद ही है। चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, कनिष्क, समुद्रगुप्त और द्वितीय चन्द्रगुप्त को भारतीय जनता ने पूरी तरह भुला दिया है। लेकिन राजा विक्रमादित्य की स्मृति को विक्रम सम्वत्सर के रूप में आदर के साथ सहेज कर रखा है।
Motivational Speech on Vedas in Hindi by Dr. Sanjay Dev
Ved Katha Pravachan _21 | Introduction to the Vedas | विद्या प्राप्ति के प्रकार एवं परमात्मा के दर्शन
भक्ति की समरसता के प्रतीक नव सम्वत् का महत्व वैदिक काल से ही स्वीकार किया जाता है। देश के प्रायः सभी प्रान्तों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष के रूप में ही मान्यता प्राप्त हुई है। महाराष्ट्र में यह दिवस ‘गुड़ी पड़वा’ कहलाता है। सिन्धी समाज में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘चेटी चण्ड’ के रूप में मानकर नववर्ष का स्वागत किया जाता है। सिन्ध प्रान्त में हिन्दू धर्मरक्षक श्री झूलेलाल का जन्म भी इसी दिन हुआ था। पंजाब में नववर्ष के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और मेष संक्रान्ति (वैशाखी) को समान महत्व दिये जाने पर भी उमंग वैशाखी पर ही दृष्टिगोचर होता है। सन् 1919 ई. की वैशाखी को जलियाँवाला बाग में निरपराध भारतीयों का अंग्रेजों ने जो नरसंहार किया था, उसे कभी भी नहीं भुलाया जा सकता है।
आचार्य भास्कर ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि में लिखा है कि चैत्र मास शुक्ल पक्ष के आरम्भ में दिन, मास, वर्ष, युग एक साथ आरम्भ हुए। इसी कारण भारतवर्ष में कई सम्वत् चैत्र प्रतिपदा से आरम्भ किए गए। विक्रम सम्वत् चैत्र प्रतिपदा के अतिरिक्त अनेक सम्वत् प्रचलन में हैं, जिनमें सृष्टि सम्वत्, कलियुग सम्वत्, बुद्ध निर्वाण सम्वत्, वीर निर्वाण सम्वत्, मौर्य निर्वाण सम्वत् आदि प्रमुख हैं। इन अनेक सम्वतों के होते हुए भी भारत में विक्रम सम्वत् ही सर्वाधिक प्रचलित है। यह सम्वत् किसी सम्प्रदाय विशेष का सम्वत् नहीं है। मातृभूमि को विदेशी शक्तियों से मुक्त कराने वाले वीर प्रतापी राजा विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित यह सम्वत् सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को अपने भीतर समेटता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि राजा विक्रमादित्य नवसम्वत्सर के दिन ही सिंहासनारूढ़ हुए थे और मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने का संकल्प लिया था, जिसे उन्होंने पूरा भी किया।
संस्कृत ही किसी देश की प्रगति का आधार होती है, जो उसमें स्वाभिमान भर देती है और राष्ट्र कर्मशीलता में प्रवृत्त हो जाता है। काम करने की इच्छा अर्थात् संकल्पशक्ति होने के बाद सब प्रकार के कार्यों के लिए रास्ता निकल आता है। कार्य करने की इच्छा बनाने में स्वाभिमान अर्थात् अस्मिता ही प्रमुख होती है। हम अपनी अस्मिता को तभी पहचान सकेंगे जब हर पल चलने वाला हमारा काल-क्रम हमें हर क्षण अपनी संस्कृति की याद दिलाता रहेगा। अतः यदि संस्कृति को बचाना है तो उसके मूलभूत आधार पर हम अपनी कालगणना के आधार को समझें। हमें अपने जीवन में अपनी संस्कृति के सकारात्मक पहलुओं पर दृढ़ आस्था रखनी है तथा उसके अनुकूल अपने जीवन में आचरण करना है। अतः भारतीयों को नवसम्वत्सर को ही नववर्ष के रूप में मनाना चाहिए न कि ईसाइयों के एक जनवरी से आरम्भ होने वाले नववर्ष को।
हमारे देश की समुन्नत संस्कृति प्रकृति के साथ गहरे रूप से जुड़ी है। पृथ्वी के वातावरण में शीतोष्ण की विषमता पाई जाती है। इस विषमता के कारण शरीर में वात, पित्त और कफ की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। आयुर्वेद इन तीन दोषों की समता को ही मानवता के स्वास्थ्य का आधारभूत सिद्धान्त मानता है। सम्वत्सर के आरम्भ की मान्यता इस दिन से हटकर भला और किस दिन मानी जा सकती है! (दिव्ययुग- अप्रैल 2013)
Sanskrit is the basis of the progress of a country, which fills self-respect in it and the nation becomes inclined towards action. After having the will to work, that is, the willpower, the path comes out for all kinds of work.