संस्कृत में अग्नि में भुने हुए अर्द्ध पक्व अन्न को ‘होलक’ कहते हैं, हिन्दी का प्रचलित ‘होला’ शब्द इसी का अपभ्रंश है। आषाढी नवान्नेष्टि में नवागत अधपके यवों के होम के कारण उसको ‘होलिकोत्सव’ कहते हैं।
एक समय महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने अपने दरबार के राजकवि चन्द से पूछा कि हम लोगों में जो होली के त्योहार का प्रचार है, वह क्या है? हम सभ्य आर्य लोगों में ऐसे अनार्य महोत्सव का प्रचार क्योंकर हुआ कि आबाल-वृद्ध सभी उस दिन पागल से होकर बीभत्स रूप धारण करते तथा अनर्गल और कुत्सित वचनों का निर्लज्जतापूर्वक उच्चारण करते हैं। यह सुनकर कवि बोले- ‘‘राजन! इस महोत्सव की उत्पत्ति का विधान होली की पूजा विधि में पाया जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा में (होलिकोत्सव) होली का पूजन कहा गया है। उसमें लकड़ी और घास-फूस का बड़ा भारी ढेर लगाकर वेदमन्त्रों से विस्तार के साथ होलिका दहन किया जाता है। इसी दिन हर महीने की पूर्णिमा के हिसाब से इष्टि (छोटी सा यज्ञ) भी होता है। इस कारण भद्रा रहित समय में होलिका दहन होकर इष्टि यज्ञ भी हो जाता है। पूजन के बाद होली की भस्म शरीर पर लगाई जाती है।
होली के लिए प्रदोष अर्थात् सायंकाल व्यापिनी पूर्णिमा लेनी चाहिए और उसी रात्रि में भद्रारहित समय में होली प्रज्ज्वलित करनी चाहिए।’’ चन्द कवि आगे कहने लगे कि फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन जो मनुष्य चित्त को एकाग्र करके हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविन्द पुरुषोत्तम का दर्शन करता है, वह निश्चय ही बैकुण्ठ में जाता है। यह उत्सव होली के दूसरे दिन होता है। यदि पूर्णिमा की पिछली रात्रि में होली जलाई जाए तो यह उत्सव प्रतिपदा को होता है और इसी दिन अबीर गुलाल की फाग होती है। उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त इस फाल्गुणी पूर्णिमा के दिन चतुर्दश मनुओं में से एक मनु का भी जन्म है। इस कारण यह मन्वादि तिथि भी है। अतः इसके उपलक्ष्य में भी उत्सव मनाया जाता है। कितने ही शास्त्रकारों ने तो संवत् के आरम्भ एवं बसन्तागमन के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है और जिसके द्वारा अग्नि के अधिदेव स्वरूप का पूजन होता है, वही पूजन इस होलिका का माना है। इस कारण कोई-कोई होलिका दहन को संवत् के आरम्भ में अग्निस्वरूप परमात्मा का पूजन मानते हैं।
वैदिक धर्मावलम्बियों में प्राचीन काल से यह प्रथा चली आती है कि नवीन वस्तुओं को देवों को समर्पण किए बिना अपने उपयोग में नहीं लाया जाता है। जिस प्रकार मानव देवों में ब्राह्मण वर्ण सर्वश्रेष्ठ है उसी प्रकार भौतिक देवों में अग्नि सर्वप्रधान है। वह विद्युत रूप से ब्रह्माण्ड में व्यापक है। देवयज्ञ का प्रधान साधन भौतिक अग्नि ही है। क्योंकि वह सब देवों का दूत है। वेद में उसको अनेक बार ‘देवदूत’ कहा गया है। वही सब देवों को होमे हुए द्रव्य पहुंचाता है। इसलिए यज्ञ के माध्यम से होलिकोत्सव पर नवागत अन्न सर्वप्रथम अग्नि के ही अर्पण किए जाते हैं और तदन्तर मानवदेव ब्राह्मण वर्ण के विद्वजनों को भेंट करके अपने उपयोग में लाए जाते हैं। इसलिए अब तक भी जन साधारण में यह प्रथा प्रचलित है कि जब तक नवीन अन्नों को व फलों को पूजा के प्रयोग में न लाया जाए, तब तक उनको लोकभाषा में ‘अछूत व छूते’ कहते हैं। तदनुसार ही आषाढी की नवीन फसल आने पर नए यवों (अन्नों) को होमने के लिए इस अवसर पर प्राचीनकाल में नवसस्येष्टि होलिकेष्टि वा होलिकोत्सव होता था।
वर्तमान समय में लकड़ी और उपलों के ढेरों के रूप में होली जलाने की प्रथा प्राचीन सामूहिक नवसस्येष्टियों का विकृत रूप है। वैदिक संस्कृति के दृष्टिकोण से होलिकोत्सव इस आषाढी नवान्नेष्टि का उपर्युक्त देवयज्ञ द्वारा देवपूजन, विद्वद्समादर, वायु संशोधन, गृह परिमार्जन तथा नवीन वस्त्र परिवर्तन धार्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप है।
वस्तुतः होली प्रेम प्रसार का पर्व है। इस पर्व पर सब लोग ऊंच-नीच, छुटाई-बढ़ाई का विचार छोड़कर भारतक के सभी प्रान्तों में हिन्दू, ईसाई, मुसलमान आदि सभी नागरिक स्वच्छ हृदय से आपस में मिलते हैं। यदि किसी कारणवश वर्ष में वैर-विरोध ने मनों को अपना आवास बना लिया है तो उनको अग्निदेव की साक्षी में भस्मसात कर लिया जाता है। यह होली दो फटे हृदयों को मिलाती है तथा एकता का पाठ पढ़ाती है। होली का पवित्र पर्व आनन्द और उल्लास का महोत्सव था। किन्तु काल की कराल गति के कारण आजकल उसमें भी कदाचार और अभद्र दृश्य प्रवेश पा गए हैं। आजकल भाभियों से होली खेलने के रसिया शराब के नशे में धुत्त होकर शिक्षित, अर्ध-शिक्षित, अनपढ़ सभी तरह के लोग राक्षसीय लीलाएं करते हुए त्यौहारों की रक्षा की दुहाई देते हुए इस होलिकोत्सव (फाग) पर जो हुल्लड़ मचाते हैं उन्हें देखकर लज्जा को भी लज्जा आती है। फाग के बहाने अपने इष्ट-मित्रों-साथी संगियों के श्रेष्ठ वस्त्रों को लाल-पीले-हरे रंग से लतपत करके उनके मुंह पर गुलाल लपेटकर तथा आँखों में अबीर झोंककर उनकी वह दुर्गत बनाते हैं कि उनको देखकर दया आती है।
इस आधुनिक रंग बिखेरने और गुलाल उड़ाने की कुप्रथा का मूल प्राचीनकाल में यह प्रतीत होता है कि पुराने भारतवासी इस पवित्र पर्व पर सुगन्धित द्रव्यों को परस्पर उपहार रूप में देते थे। इस अवसर पर जबकि बसन्त यौवन पर होता है, पीताम्बर धारण करते थे। गुलाब जल का छिड़काव भी शायद होता हो। इस अवसर पर शिक्षाप्रद नाटकों (अभिनयों) के खेलने की रीति प्रचलित थी। महाभारत काल के बाद इस पर्व पर कुछ वाममार्गी प्रथाएं प्रचलित हो गई जो अशोभनीय है।
भविष्य पुराण के अनुसार नारद जी ने राजा युधिष्ठिर से होली के सम्बन्ध में कहा था कि फाल्गुण की पूर्णिमा को सब मनुष्यों के लिए अभयदान देना चाहिए। पौराणिक इस पर्व से दैत्यराज हिरण्यकशिपु की भगिनी और प्रलाद की भुआ, जो प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी थी, जिसका नाम होलिका था वह जल गई और प्रह्लाद बच गया था, प्रतिवर्ष होलिका नाम से होली जलाने का सम्बन्ध मानते हैं। तथ्य चाहे कुछ भी हों हवन-यज्ञ को तो इस अवसर पर सभी सम्प्रदाय व मतमतान्तरों वाले स्वीकार करते हैं। होली भी एक यज्ञ का विकृत रूप है जो हमें यज्ञीय (यज्ञरूप) जीवन की प्रेरणा देता है। - प्रतापसिंह शास्त्री (दिव्ययुग - मार्च 2013)
Motivational Speech on Vedas in Hindi by Dr. Sanjay Dev
Explanation of Vedas | बालक निर्माण के वैदिक सूत्र एवं दिव्य संस्कार-2