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सत्ताधारी राम के जीवन से शिक्षा लें

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ram ke jivan se shiksha le

तपस्वी वाल्मीकि मुनि ने एक बार तप और स्वाध्याय में संलग्न विद्वान नारद से पूछा-
‘‘हे मुनिवर, इस समय संसार में गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता और अपने व्रत में दृढ पुरुष कौन है? सदाचार से युक्त सब प्राणियों के कल्याण में तत्पर, विद्वान, सामर्थ्यशाली और देखने में सबसे सुन्दर पुरुष कौन है? जो तपस्वी तो हो परन्तु क्रोधी न हो। तेजस्वी तो हो परन्तु ईर्ष्यालु न हो और इन सब दया, अक्रोध आदि गुणों से युक्त होते हुए भी जब रोष आ जाये तो जिसके सामने देवजन भी कांपने लगें। हे तपेश्‍वर, यदि आप किसी ऐसे महापुरुष को जानते हों तो उसका वृतान्त मुझको बताइये, क्योंकि आप त्रिलोक भ्रमण करने वाले हैं।’’

वाल्मीकि मुनि के प्रश्‍न का उत्तर देते हुए नारदमुनि ने कहा कि ‘‘अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुआ राम नाम से जो प्रसिद्ध राजा राज करता है वह उन सब गुणों से युक्त है जिनका आपने उल्लेख किया है।’’ नारदमुनि ने राम का तब तक का सम्पूर्ण चरित्र भी संक्षेप में महर्षि को सुना दिया।

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राम के उदात चरित्र को लिखने की प्रेरणा महर्षि वाल्मीकि को क्योंकर हुई, इसका विवरण वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में भावपूर्ण शब्दों में अंकित है। वियोगजन्य क्रौंच पक्षी के करुणक्रन्दन से द्रवीभूत हुए महर्षि के मुख से निकली- माः निषाद...- ये छन्दोबद्ध पंक्तियां ही रामायण की रचना का प्रेरक कारण बनीं।

अपनी रामायण में महर्षि ने उपर्युक्त सब प्रश्‍नों का विस्तार से उत्तर दिया है, जो उन्होंने नारद मुनि से किये थे। राम के पावन चरित्र का जितना अच्छा और संक्षिप्त विवरण उन प्रश्‍नों में है उतना अन्यत्र मिलना कठिन हैं। सारी रामायण को उन्हीं प्रश्‍नों की विशद व्याख्या कह सकते हैं।

उन प्रश्‍नों को एक-एक करके लेते जाइये और राम कथा से उनका उत्तर लेते जाइये। पहिला प्रश्‍न यह है कि ऐसा व्यक्ति कौन सा हैं जो गुणवान भी हो और पराक्रमी भी।

यह बड़ा व्यापक प्रश्‍न है। बहुत से व्यक्ति गुणवान होते हैं परन्तु पराक्रमी नहीं होते। बहुत से पराक्रमी होते हैं परन्तु गुणवान नहीं होते। राम इन दोनों गुणों का समुच्चय थे। उनमें भगवान के दया और मन्यु इन दोनों गुणों का मिश्रण था। इसी कारण कुछ लोग उन्हें अवतार शब्द से याद करते हैं। हम उन्हें पुरुषोत्तम के नाम से पुकारते हैं, जैसा कि अन्य प्रश्‍नों की व्याख्या से स्पष्ट है।

महर्षि पूछते हैं- ‘‘ऐसा कौन सा व्यक्ति है जो धर्म को जानने वाला हो, किए हुए उपकार को मानने वाला, सदा सत्य बोलने वाला और व्रत पर दृढ रहने वाला हो? इन शब्दों से धर्मज्ञ एवं गुणवान की बात की विशद व्याख्या हो जाती है। वाल्मीकि के राम के जिस रुप का पाठक के मन पर चित्र अंकित होता है वह धर्म को जानने वाला है, प्रत्येक संकट के समय वह इस प्रश्‍न पर विचार करता है कि धर्म वा कर्त्तव्य क्या है? आँखे बन्द करके परिस्थितियों के पीछे नहीं भागता।’’

जब केकयी ने महाराज दशरथ के वचन को सत्य सिद्ध करने के लिए वन गमन की सूचना दी, तब राम ने कर्त्तव्य को ही सर्वोपरि स्थान दिया। जब भरत उन्हें वन से लौटाने के लिए गये और मन्त्रियों तक ने उन्हें अयोध्या लौटाने की प्रेरणा की, तब भी उन्होंने कर्त्तव्य को सर्वोपरि रखा। जब जाबाल ने उनके समक्ष पार्थिव प्रलोभन रखकर तर्क-वितर्क के द्वारा उनका घर लौटना समुचित सिद्ध करने की चेष्टा की, तब उन्होंने जो उत्तर दिए वे धर्म के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगे। उन्होंने कहा - ‘‘अपने को वीर कहलाने वाला व्यक्ति कुलीन है या अकुलीन है, पवित्र है या अपवित्र यह उसके चरित्र से ही विदित हो सकता है। यदि मैं धर्म का ढोंग करूं परन्तु आचरण करुं धर्म के विरुद्ध, तो कैसे समझदार पुरुष मेरा मान करेगा। उस दशा में मैं कुल का कलंक ही माना जाऊंगा।’’

इस प्रश्‍न का दूसरा भाग यह है कि किए हुए उपकार को मानने वाला कौन है? यदि कृतज्ञता का आदर्श देखना हो तो राम को देखो।
सुग्रीव और विभीषण ने राम की संकट के समय सहायता की। राम ने उन दोनों का संकट निवारण करके और उन दोनों को ही राज्य दिलाकर उस सहायता का जो भव्य बदला दिया था, वह राम की कृतज्ञता की भावना का ज्वलन्त प्रतीक है।

इस प्रश्‍न का तीसरा भाग सत्य से सम्बद्ध है। राम की सत्यवादिता ने सत्य को गौरवान्वित किया था, यदि यह कहा जाये तो इसमें अत्युक्ति न होगी। राम सत्य के जीते जागते स्वरूप थे। यदि राम कुछ है तो वह सत्य ही है। सत्य कहना और सत्य करना- ये दो राम के मुख्य गुण थे। राम के दो वाक्य ही उनके अपने चरित्र का सांगोपांग चित्रण कर देते हैं। महाराज दशरथ के समक्ष केकयी ने जब राम को वनवास जाने का कठोर आदेश देने में कुछ आगा-पीछा किया तो राम ने कहा था- ‘‘हे देवी ! राजा क्या चाहते हैं, यह मुझे बताइये। मैं उसे पूरा करूंगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है। राम किसी बात को दूसरी बार नहीं कहता। न आज तक मैंने कभी झूठ बोला है और न आगे कभी बोलूंगा।’’ वस्तुतः सत्य और उसके पालन में दृढता राम के भव्य जीवन के दो प्रधान तत्व हैं।

अगला प्रश्‍न है कि जो तपस्वी तो हो परन्तु क्रोधी न हो, तेजस्वी तो हो परन्तु ईर्ष्यालु न हो।

तपस्वियों को क्रोधावेश में शाप देते हुए तो बहुत कुछ सुना जाता है, वरदान देते हुए कम। इसलिए उनके तप का गृहस्थीजन के समक्ष वैसा महत्व नहीं रहता जैसा रहना चाहिए और वह तप के साथ अक्रोध का सम्मिश्रण रहने से ही रह पाता है। ये दोनों परस्पर विरोधी गुण एक दूसरे की आभा को बिगाड़ने वाले नहीं, अपितु मिलकर चित्र को सुन्दर एवं पूरा बनाने में सहायक होते हैं।

राम में सत्य है, शक्ति है, क्षमा है, कृतज्ञता है, क्रोध नहीं है और न ईर्ष्या द्वेष है। तब तो उसे शान्त और शीतल होना चाहिए। फिर किसी दुष्ट को उससे डरने की क्या आवश्यकता है? परन्तु जिस व्यक्ति की शान्ति में अग्नि अन्तर्हित नहीं, वह संसार में किसी काम का शासक नहीं हो सकता। उसे शायद पुरुष तो कह सकें, पुरुषोत्तम नहीं कह सकते। वाल्मीकि मुनि ने सारी रामायण में अपने अन्तिम प्रश्‍न का उत्तर बड़ी सुन्दरता से दिया है। प्रश्‍न यह है-
वह कौन है कि इन सब गुणों के होते हुए भी जब रोष आ जाये तब देवता भी उसके सामने कांपने लगें?

क्रोध निकृष्ट भावना है। जिस मनुष्य को क्रोध नहीं आता वह मूर्ख होता है और जो क्रोध पर काबू रखता है वह बुद्धिमान होता है। परन्तु क्रोध से भी अधिक उदात्त भावना होती है जो मानव के तेज की सूचक होती है। जो मनुष्य अन्याय, असत्य या अत्याचार को सहन कर लेता है वह अपने व्यक्तित्व पर अत्याचार करता है और उसके क्षमा, दया आदि गुण दोष रूप में दीखने लगते हैं। क्योंकि ये कायरता के रूपान्तर होते हैं। धर्मज्ञ राम की शक्ति का वर्णन करते हुए रावण की सभा में विभीषण ने कहा थाः-
‘‘इक्ष्वाकुवंश का अवधेश राम धर्मात्मा है, यह समझकर निःशंक नहीं होना। वह दुष्टों को दण्ड देने की शक्ति रखता है, इस कारण उसके सामने तो देवगण भी हतबुद्धि हो जाते हैं, मनुष्यों या राक्षसों की तो कथा ही क्या है?’’

रावण के वध के पश्‍चात जब भगवती सीता राम के निकट पहुंची, तब राम ने जो शब्द कहे थे उनमें धर्मज्ञ राम का रौद्ररूप प्रतिबिम्बित हो रहा था। उन्होंने कहा था-
‘‘हमने अपने शत्रु के साथ ही अपमान को भी मारकर गिरा दिया, आज हमारा पराक्रम प्रकाशित हुआ। आज हमारी प्रतिज्ञा पूरी हुई। जो मनुष्य अपने अपमान को तेज द्वारा दूर नहीं करता, उस अल्प तेजस्वी मानव का पुरुषार्थ व्यर्थ है।’’

इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि ने नारद मुनि से जो प्रश्‍न किए थे, सम्पूर्ण रामायण में उनके उत्तर देकर संसार के सामने मनुष्यत्व का एक अमर आदर्श स्थापित कर दिया है। वस्तुतः राम के इस ऊंचे आदर्श को देखकर अनायास ही युरोप के प्रसिद्ध विद्वान ग्रिफिथ ने लिखा था कि वाल्मीकि रामायण प्रत्येक युग और प्रत्येक देश के साहित्य को यह चुनौती दे सकती है कि लाओ राम और सीता के सदृश पूर्ण आदर्श चरित्र का नमूना पेश करो।

चरित्र की उस पूर्णता के कारण राम को हम पुरुषोत्तम या मर्यादापुरुषोत्तम कहकर पूजते हैं और राम एवं सीता के पावन चरित्र के कारण ही वाल्मीकि रामायण के विषय में ब्रह्मा का यह आशीर्वाद सफल हो रहा है कि-
यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्‍च महीतले।
तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥
जब तक संसार में सभी पर्वत और नदियां विद्यमान रहेंगी तब तक तुम्हारी रची रामकथा का प्रचार होगा। - आचार्य डॉ.संजयदेव (दिव्ययुग - अक्टूबर 2019)